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होम लोन पर आरबीआई के नए निर्देश से बैंक-बिल्डर के बीच नहीं पिसेगा ग्राहक

Comments Off on होम लोन पर आरबीआई के नए निर्देश से बैंक-बिल्डर के बीच नहीं पिसेगा ग्राहक   |   September 17, 2013    03:03pm   |Contributed by manoja

•अमर उजाला ब्यूरो
नोएडा/गुड़गांव। कंस्ट्रक्शन लिंक प्लान से ही लोन जारी करने के भारतीय रिजर्व बैंक के आदेश से फ्लैट खरीदने वालों के पैसे की सुरक्षा तो बढ़ गई मगर रियल एस्टेट इसे सकारात्मक कदम के रूप में नहीं गिन रहा। कुछ जानकारों का कहना है कि इससे न केवल पुराने प्रोजेक्ट प्रभावित होंगे, बल्कि नई परियोजनाओं को शुरू करने में भी परेशानी आएगी।
गुड़गांव एक्सटेंशन, नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण के क्षेत्र में दो सौ से अधिक प्रोजेक्ट में हजारों फ्लैट बन रहे हैं। इनमें से ऐसे बिल्डरों की तादाद काफी है, जिनको डाउन पेमेंट प्लान के तहत एकमुश्त भुगतान किया जा चुका है। एकमुश्त भुगतान लेने के बाद बिल्डर फ्लैट बेचने के लिए बायर्स को ऑफर देते हैं कि वे पजेशन तक ग्राहक से ब्याज नहीं लेंगे। खुद से किश्त भरेंगे।
इस बीच अगर बिल्डर समय पर पजेशन नहीं दे पाता तो फ्लैट बुक कराने वाले ग्राहक के सिर ईएमआई का बोझ आ जाता है। आरबीआई के नए दिशा निर्देश के बाद अब बैंक बिल्डर को प्रोजेक्ट के निर्माण के हिसाब से ही लोन जारी करेगा, जिससे पैसा डूबने का डर नहीं रहेगा।
न्यू गुड़गांव-सोहना मास्टर प्लान 2031 को मंजूरी मिलने के बाद गुड़गांव एक्सटेंशन के लिए भूमि आवंटित की गई है। डेवलपर्स यहां 1500 से 1700 रुपये प्रति वर्ग फुट में आवासीय एफएसआई की उम्मीद कर रहे हैं। इससे यहां के बहुमंजिला अपार्टमेंट में 3500 से 4000 रुपये प्रति वर्ग फुट में आशियाना मिल सकेगा। दीपावली से बुकिंग शुरू करने की योजना है। अब आरबीआई ने बैंकों को होम लोन, कंस्ट्रक्शन लिंक्ड पेमेंट प्लान से जारी करने की हिदायत देकर रियल एस्टेट की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
प्रॉपटी विशेषज्ञ कार्तिक तिवारी बताते हैं कि प्लान से डेवलपर्स को होल्ड मनी अधिक नहीं मिल पाएगी। इससे नई परियोजनाओं को पूरा करने में मुश्किल आएगी। द्वारका-मानेसर एक्सप्रेस वे पर करीब 60 फीसदी प्रोजेक्ट पहले ही देरी से चल रहे हैं। ऐसे में दोहरा बोझ पड़ेगा।
बिल्डरों ने अभी भी चला रखी है 20ः80 स्कीम
क्या है यह स्कीम
यह ऐसी डाउन पेमेंट स्कीम है जिसमें बायर बैंक लोन लेकर बिल्डर को प्रॉपर्टी की पूरी कीमत अदा कर देता है। बायर को अपनी जेब से 20 फीसदी भुगतान डील के समय तुरंत करना होता है जबकि बाकी 80 प्रतिशत राशि बैंक से बिल्डर को मिलती है। मुख्य बात यह है कि बिल्डर इस स्कीम में बायर से वादा करता है कि एक निश्चित समय तक बैंक लोन पर बनने वाले ब्याज की राशि वह बैंक को चुकाएगा और बायर पर उस दौरान ईएमआई चुकाने का बोझ नहीं रहेगा। आम तौर पर यह निश्चित अवधि दो से तीन साल होती है व बायर से यही कहा जाता है कि यह नो ईएमआई स्कीम है। मतलब प्रापर्टी पर कब्जा मिलने तक बैंक लोन पर ईएमआई चुकाने का झंझट नहीं रहेगा।
लेकिन इसमें निम्नलिखित खतरे रहते हैं
पजेशन शब्द
कई बार इस स्कीम में पजेशन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बस यह कहा जाता है कि तीन या दो साल तक ईएमआई नहीं चुकानी होगी। अब अगर निर्माण पूरा नहीं हुआ और किसी भी वजह से पजेशन नहीं हुआ तो बैंक तो तीन या दो साल की अवधि पूरी होते ही बायर से ईएमआई वसूलना आरंभ कर देगा। ऐसे में बैंक व बायर दोनों फंस जाएंगे। बायर का उधारी रिकार्ड खराब होगा और बैंक का एनपीए यानी अनुत्पादक ऋण बढ़ेगा।
20-80 स्कीम के मुकाबले सादा कंसट्रक्शन लिंक्ड प्लान ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि इसमें बिल्डर को प्रापर्टी की कीमत किस्तों में धीरे धीरे मिलती है और जितना निर्माण होता है उतना ही भुगतान बैंक और बायर की तरफ से किया जाता है। इस तरह जब तक निर्माण कार्य पूरा नहीं होता, तब तक पूरी पेमेंट बिल्डर की जेब में नहीं पहुंचती। रिजर्व बैंक की ताजा गाइडलाइन यह है कि बैंक कंस्ट्रक्शन लिंक्ड होमलोन ही दे सकते हैं।
निर्माण में देरी
चूंकि इस स्कीम में बिल्डर के हाथ में सिर्फ ब्याज चुकाने के वादे की एवज में समूची कीमत नकद आ जाती है, वह चाहे तो आसानी से इस राशि का इस्तेमाल किसी और प्रोजेक्ट में कर सकता है। इस तरह के फंड डाइवर्जन के अलावा वह निर्माण में भी ढीलापन दिखा सकता है।
बायर्स पर मिला जुला असर
आरबीआई के नए दिशा-निर्देश से बायर्स को फायदा भी मिलेगा और नुकसान भी। फायदा इस तरह से है कि खरीदारों का पैसा सुरक्षित रहेगा। बिल्डर जिस प्रोजेक्ट को लांच करेगा, उसका काम सबसे पहले पूरा कराएगा। इससे समय पर पजेशन मिल सकेगा। नुकसान यह है कि लांचिंग के समय बिल्डर प्रति वर्ग फुट कीमत कम रखते हैं। जैसे-जैसे निर्माण कार्य पूरा करते जाते हैं, वैसे-वैसे कीमत भी बढ़ा देते हैं। उदाहरण के तौर पर नोएडा में अगर प्रोजेक्ट शुरू होने वाले फ्लैटों की कीमत चार हजार रुपये प्रति वर्ग फुट होती है तो जिन प्रोजेक्ट का काम पूरा होने वाला है, उन फ्लैटों की कीमत छह हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से ली जाती है।
-अभिषेक कुमार
अध्यक्ष नोएडा एक्सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेलफेयर एसोसिएशन
हमने डाउन पेमेंट प्लान के तहत ही लोन लिया है। बिल्डर पजेशन तक बैंक लोन पर ब्याज खुद चुकाएगा। अब तक किस्त जाती रही है। इससे मन में डर तो लगा ही रहता है कि पजेशन तक कोई दिक्कत न आ जाए। -गोपी रमन आलोक, बायर पैरामाउंट
बिल्डरों पर असर नहीं
एनसीआर के 95 प्रतिशत बिल्डरों को पहले से कंस्ट्रक्शन लिंक प्लान के तहत ही लोन मिलता है। पांच फीसदी बिल्डर ही ऐसे होंगे, जिनको बैंक ने एकमुश्त भुगतान किया होगा। ऐसे में इसका ज्यादा असर बिल्डरों पर नहीं पड़ेगा, मगर बायर्स को इससे नुकसान होगा। अब बिल्डर बायर्स को पजेशन तक ब्याज से मुक्त रखने की सुविधा नहीं दे पाएंगे। इससे उनको मिलने वाली छूट खत्म हो जाएगी।
-अनिल शर्मा
अध्यक्ष, क्रेडाई एनसीआर
कंस्ट्रक्शन लिंक प्लान के तहत ही मेरे फ्लैट का लोन हुआ है। इस पर ब्याज ज्यादा देना पड़ रहा है, मगर तसल्ली है कि मेरा पैसा मेरे ही फ्लैट में लग रहा है। प्रोजेक्ट में कंस्ट्रक्शन भी चल रहा है। यह देखकर तसल्‍ल्‍ाी है कि फ्लैट में काम हो रहा है।
-श्वेता भारती, बायर, आम्रपाली
डाउन पेमेंट प्लान में बिल्डर ब्याज से मुक्त रखने की बात तो कह देते हैं। कुछ समय तक राहत भी मिल जाती है, मगर ऐसा नहीं है कि इसे छोड़ देते हैं, बल्कि अन्य तरीके से वसूल लेते हैं। इससे आम लोगों को परेशानी होती है। -प्रीत भार्गव,
बायर गौर संस
20% भुगतान डील के समय तुरंत करना होता है जबकि बाकी 80% राशि बैंक से बिल्डर को मिलती है
डाउन पेमेंट प्लान के तहत पजेशन में देरी होने पर ईएमआई की किस्त बढ़ती जाती है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान निवेशक को ही उठाना पड़ता है
•आरबीआई ने हिदायत देकर रियल एस्टेट की मुश्किलें बढ़ा दी हैं
सीएलपी प्लान भले ही महंगा होता है, मगर इसमें सेफ्टी रहती है। हमने इसी प्लान से अपना फ्लैट खरीदा है। रिजर्व बैंक ने यह अच्छा कदम उठाया है। इससे फ्लैट खरीदने वालों के सामने ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी। वह राहत महसूस करेंगे। -अन्नू खान,
बायर वेदांतम
आरबीआई की नई हिदायत के अनुसार बैंक कंस्ट्रक्शन लिंक्ड पेमेंट प्लान के तहत कर्जा देंगे। जैसे-जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ता रहेगा, उस हिसाब से बिल्डर को रकम मिलती रहेगी। अगर प्रोजेक्ट देरी से चलता है तो इसका नुकसान बिल्डर को ही उठाना होगा।
इस फैसले से फ्लैट खरीदारों की गाढ़ी कमाई बची रहेगी। बेशक बिल्डर फ्लैट खरीदारों से सीएलपी प्लान के तहत ज्यादा पैसा ले सकते हैं, मगर पैसा सुरक्षित तो रहेगा। आगे आने वाले समय में और बेहतर सुविधा मिलेगी।
-देवेंद्र कुमार,
बायर पंचशील
प्रॉपर्टी खरीदने के लिए डाउन पेमेंट प्लान, कंस्ट्रक्शन लिंक्ड पेमेंट प्लान, टाइम लिंक्ड प्लान आदि उपलब्ध होते थे। ज्यादातर लोग डाउन पेमेंट प्लान ही लेते हैं।
इस प्लान में बिल्डर को बड़ी राशि प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले ही मिल जाती है। अगर प्रोजेक्ट में देरी भी होती है तो निर्माण सामग्री पर बढ़ा खर्च परियोजनाओं को अधिक प्रभावित नहीं करता।
इसमें प्रॉपर्टी बुकिंग पर दस फीसदी और इसके बाद 60 दिन के भीतर 85 फीसदी राशि जमा होती है। शेष पांच फीसदी राशि पजेशन के वक्त देनी होती है।

http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20130905a_002105004&ileft=348&itop=447&zoomRatio=282&AN=20130905a_002105004

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